Tuesday, 7 October 2014

काल-अतंराल(Space-Time) की अवधारणा

श्याम विवर की गहराईयो मे जाने से पहले भौतिकी और सापेक्षता वाद के कुछ मूलभूत सिद्धांतो की चर्चा कर ली जाये !
त्री-आयामी
त्री-आयामी

काल-अंतराल(Space-Time) की अवधारणा

सामान्यतः अंतराल को तीन अक्ष में मापा जाता है। सरल शब्दों में लंबाई, चौड़ाई और गहराई, गणितिय शब्दों में x अक्ष, y अक्ष और z अक्ष। यदि इसमें एक अक्ष समय को चौथे अक्ष के रूप में जोड़ दे तब यह काल-अंतराल का गंणितिय माँडल बन जाता है।
त्री-आयामी भौतिकी में काल-अंतराल का अर्थ है काल और अंतराल संयुक्त गणितिय माडल। काल और अंतराल को एक साथ लेकर भौतिकी के अनेकों गूढ़ रहस्यों को समझाया जा सका है जिसमे भौतिक ब्रह्मांड विज्ञान तथा क्वांटम भौतिकी शामिल है।
सामान्य यांत्रिकी में काल-अंतराल की बजाय अंतराल का प्रयोग किया जाता रहा है, क्योंकि काल अंतराल के तीन अक्ष में यांत्रिकी गति से स्वतंत्र है। लेकिन सापेक्षता वाद के सिद्धांत के अनुसार काल को अंतराल के तीन अक्ष से अलग नहीं किया जा सकता क्योंकि , काल किसी पिंड की प्रकाश गति के सापेक्ष गति पर निर्भर करता है।
काल-अंतराल की अवधारणा ने बहुआयामी सिद्धांतो(higher-dimensional theories) की अवधारणा को जन्म दिया है। ब्रह्मांड के समझने के लिये कितने आयामों की आवश्यकता होगी यह एक यक्ष प्रश्न है। स्ट्रींग सिद्धांत जहां १० से २६ आयामों का अनुमान करता है वही M सिद्धांत ११ आयामों(१० आकाशीय(spatial) और १ कल्पित(temporal)) का अनुमान लगाता है। लेकिन ४ से ज्यादा आयामों का असर केवल परमाणु के स्तर पर ही होगा।

काल-अंतराल(Space-Time) की अवधारणा का इतिहास

काल-अंतराल(Space-Time) की अवधारणा आईंस्टाईन के १९०५ के विशेष सापेक्षता वाद के सिद्धांत के फलस्वरूप आयी है। १९०८ में आईंस्टाईन के एक शिक्षक गणितज्ञ हर्मन मिण्कोवस्की आईंस्टाईन के कार्य को विस्तृत करते हुये काल-अंतराल(Space-Time) की अवधारणा को जन्म दिया था। ‘मिंकोवस्की अंतराल’ की धारणा यह काल और अंतराल को एकीकृत संपूर्ण विशेष सापेक्षता वाद के दो मूलभूत आयाम के रूप में देखे जाने का प्रथम प्रयास था।’मिंकोवस्की अंतराल’ की धारणा यह विशेष सापेक्षता वाद को ज्यामितीय दृष्टि से देखे जाने की ओर एक कदम था, सामान्य सापेक्षता वाद में काल अंतराल का ज्यामितीय दृष्टिकोण काफी महत्वपूर्ण है।

मूलभूत सिद्धांत

काल अंतराल वह स्थान है जहां हर भौतिकी घटना होती है : उदाहरण के लिये ग्रह का सूर्य की परिक्रमा एक विशेष प्रकार के काल अंतराल में होती है या किसी घूर्णन करते तारे से प्रकाश का उत्सर्जन किसी अन्य काल-अंतराल में होना समझा जा सकता है। काल-अंतराल के मूलभूत तत्व घटनायें (Events) है। किसी दिये गये काल-अंतराल में कोई घटना(Event), एक विशेष समय पर एक विशेष स्थिति है। इन घटनाओ के उदाहरण किसी तारे का विस्फोट या ड्रम वाद्ययंत्र पर किया गया कोई प्रहार है।
पृथ्वी की कक्षा- काल अंतराल के सापेक्ष
पृथ्वी की कक्षा- काल अंतराल के सापेक्ष
काल-अंतराल यह किसी निरीक्षक के सापेक्ष नहीं होता। लेकिन भौतिकी प्रक्रिया को समझने के लिये निरीक्षक कोई विशेष आयामों का प्रयोग करता है। किसी आयामी व्यवस्था में किसी घटना को चार पूर्ण   अंकों(x,y,z,t) से निर्देशित किया जाता है। प्रकाश किरण यह प्रकाश कण की गति का पथ प्रदर्शित करती है या दूसरे शब्दों में प्रकाश किरण यह काल-अंतराल में होनेवाली घटना है और प्रकाश कण का इतिहास प्रदर्शित करती है। प्रकाश किरण को प्रकाश कण की विश्व रेखा कहा जा सकता है। अंतराल में पृथ्वी की कक्षा दीर्घ वृत्त(Ellpise) के जैसी है लेकिन काल-अंतराल में पृथ्वी की विश्व रेखा हेलि़क्स के जैसी है।
पृथ्वी की कक्षा- काल अंतराल के सापेक्ष सरल शब्दों में यदि हम x,y,z इन तीन आयामों के प्रयोग से किसी भी पिंड की स्थिती प्रदर्शित कर सकते है। एक ही प्रतल में दो आयाम x,y से भी हम किसी पिंड की स्थिती प्रदर्शित हो सकती है। एक प्रतल में x,y के प्रयोग से, पृथ्वी की कक्षा एक दीर्घ वृत्त के जैसे प्रतीत होती है। अब यदि किसी समय विशेष पर पृथ्वी की स्थिती प्रदर्शित करना हो तो हमें समय t आयाम x,y के लंब प्रदर्शित करना होगा। इस तरह से पृथ्वी की कक्षा एक हेलिक्स या किसी स्प्रींग के जैसे प्रतीत होगी। सरलता के लिये हमे z आयाम जो गहरायी प्रदर्शित करता है छोड़ दिया है।
काल और समय के एकीकरण में दूरी को समय की इकाई में प्रदर्शित किया जाता है, दूरी को प्रकाश गति से विभाजित कर समय प्राप्त किया जाता है।

काल-अंतराल अन्तर(Space-time intervals)

काल-अंतराल यह दूरी की एक नयी संकल्पना को जन्म देता है। सामान्य अंतराल में दूरी हमेशा धनात्मक होनी चाहिये लेकिन काल अंतराल में किसी दो घटना(Events) के बीच की दूरी(भौतिकी में अंतर(Interval)) वास्तविक , शून्य या काल्पनिक(imaginary) हो सकती है। ‘काल-अंतराल-अन्तर’ एक नयी दूरी को परिभाषित करता है जिसे हम कार्टेशियन निर्देशांको मे x,y,z,t मे व्यक्त करते है।
s2=r2-c2t2
s=काल-अंतराल-अंतर(Space Time Interval) c=प्रकाश गति
r2=x2+y2+z2
काल-अंतराल में किसी घटना युग्म (pair of event) को तीन अलग अलग प्रकार में विभाजित किया जा सकता है
  • १.समय के जैसे(Time Like)- दोनो घटनाओ के मध्य किसी प्रतिक्रिया के लिये जरूरत से ज्यादा समय व्यतित होना; s2 <0)
  • २.प्रकाश के जैसे(Light Like)-(दोनों घटनाओ के मध्य अंतराल और समय समान है;s2=0)
  • ३.अंतराल के जैसे (दोनों घटनाओ के मध्य किसी प्रतिक्रिया के लिये जरूरी समय से कम समय का गुजरना; s2>0) घटनाये जिनका काल-अंतराल-अंतर ऋणात्मक है, एक दूसरे के भूतकाल और भविष्य में है।
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विश्व रेखा(World Line) : भौतिकी के अनुसार किसी पिंड का काल-अंतराल के चतुर्यामी तय किये गये पथ को विश्व रेखा कहा जाता है।
हेलि़क्स : स्प्रिंग या स्क्रू के जैसा घुमावदार पेंचदार आकार।

क्या समय यात्रा संभव है?

एच जी वेल्स के उपन्यास “द टाईम मशीन” मे नायक एक विशेष कुर्सी पर बैठता है जिस पर कुछ जलते बुझते बल्ब लगे होते है, कुछ डायल होते है , नायक डायल सेट करता है, कुछ बटन दबाता है और अपने आपको भविष्य के हज़ारों वर्षों बाद में पाता है।
समय यान (Time Machine)- २००२ मे बनी हालीवुड की फिल्म मे दिखाया समय यान
उस समय तक इंग्लैड नष्ट हो चुका होता है और वहां पर मार्लाक और एलोई नामक नये प्राणीयों का निवास होता है। यह विज्ञान फतांसी की एक महान कथा है लेकिन वैज्ञानिकों ने समय यात्रा की कल्पना या अवधारणा पर कभी विश्वास नही किया है। उनके अनुसार यह सनकी,रहस्यवादी और धुर्तो के कार्यक्षेत्र की अवधारणा है , उनके पास ऐसा मानने के लिये ठोस कारण भी है। लेकिन क्वांटम गुरुत्व (Quantum Gravity) मे आश्चर्यजनक रूप से प्रगति इस अवधारणा की चूलो को हिला रही है।
समय यात्रा की अवधारणा की राह में सबसे बड़ा रोड़ा इससे जुड़े पहेलीयों जैसे ढेर सारे विरोधाभास (Paradox) है।
विरोधाभास १:
इस उदाहरण के  अनुसार कोई व्यक्ति बिना माता पिता के भी हो सकता है। क्या होगा जब कोई व्यक्ति भूतकाल में जाकर अपने पैदा होने से पहले अपने माता पिता की हत्या कर दे ? प्रश्न यह है कि यदि उसके माता-पिता उसके जन्म से पहले ही मर गये तो उनकी हत्या करने के लिये वह व्यक्ति पैदा कैसे हुआ ?
विरोधाभास २:
यह ऐसा विरोधाभास है जिसमे एक व्यक्ति का कोई भूतकाल नहीं है। उदाहरण के लिये मान लेते है कि एक युवा आविष्कारक अपने गैराज में बैठ कर समययान मशीन बनाने की कोशिश कर रहा है। अचानक एक वृद्ध व्यक्ति उसके सामने प्रकट होता है और उसे समययान बनाने की विधि देकर अदृश्य हो जाता है। युवा आविष्कारक समय यात्रा से प्राप्त जानकारीयो से शेयर मार्केट, घुड़दौड़, खेलों के सट्टे से काफी सारा पैसा कमाकर अरबपति बन जाता है। जब वह बूढ़ा हो जाता है तब वह समय यात्रा कर भूतकाल में जाकर अपनी ही युवावस्था को समययान बनाने की विधि देकर आता है। प्रश्न यह है कि समययान बनाने की विधि कहां से आयी ?
विरोधाभास ३:
इस विरोधाभास मे एक व्यक्ति अपनी ही माता है। ’जेन’ को एक अनाथालय में एक अजनबी छोड़ गया था। जब जेन युवा होती है उसकी मुलाकात एक अजनबी से होती है, उस अजनबी के संसर्ग से जेन गर्भवती हो जाती है। उस समय एक दुर्घटना घटती है। जेन एक बच्ची को जन्म देते समय मरते मरते बचती है लेकिन बच्ची का रहस्यमय तरीके से अपहरण हो जाता है। जेन की जान बचाते समय डाक्टरो को पता चलता है कि जेन के पुरुष और महिला दोनों जननांग है। डाक्टर जेन को बचाने के लिये उसे पुरुष बना देते है। अब जेन बन जाती है “जिम”।इसके बाद जिम शराबी बन जाता है। एक दिन उसे भटकते हुये एक शराबख़ाने में एक बारटेंडर मिलता है जो कि एक समययात्री होता है। जिम उस समययात्री के साथ भूतकाल मे जाता है वहां उसकी मुलाकात एक लड़की से होती है। वह लड़की जिम के संसर्ग में गर्भवती हो जाती है और एक बच्ची को जन्म देती है। अपराध बोध में जिम उस नवजात बच्ची का अपहरण कर उसे एक अनाथालय मे छोड़ देता है। बाद में जिम समययात्रीयो के दल में शामिल हो जाता है और भटकती जिन्दगी जीता है। कुछ वर्षों बाद उसे एक दिन उसे सपना आता है कि उसे बारटेंडर बनकर भूतकाल में एक जिम नामके शराबी से मिलना है। प्रश्न : जेन की मां, पिता, भाई, बहन, दादा, दादी, बेटा,बेटी, नाती, पोते कौन है?
इन्ही सभी विरोधाभासो के चलते समययात्रा को असंभव माना जाता रहा है। न्युटन ने समय को एक बाण के जैसा माना था, जिसे एक बार छोड़ दिया तब वह एक सीधी रेखा मे चलता जाता है। पृथ्वी पर एक सेकंड, मंगल पर एक सेकंड के बराबर था। ब्रह्मांड मे फैली हुयी घड़ीयां एक गति से चलती थी। आइंसटाईन ने एक नयी क्रांतिकारी अवधारणा को जन्म दिया। उनके अनुसार समय एक नदी के प्रवाह के जैसे है जो सितारो, आकाशगंगाओ के घुमावो से बहता है, इसकी गति इन पिंडो के पास से बहते हुये कम ज्यादा होती रहती है। पृथ्वी पर एक सेकंड मंगल पर एक सेकंड के बराबर नही है। ब्रह्मांड मे फैली हुयी घड़ीयां अपनी अपनी गति से चलती है। आइंस्टाईन की मृत्यु से पहले उन्हे एक समस्या का सामना करना पडा था। आइंस्टाइन के प्रिन्स्टन के पड़ोसी कर्ट गोएडल (जो शायद पिछले ५०० वर्षो के सर्वश्रेष्ठ गणितिय तर्क शास्त्री है) ने आईन्स्टाईन के समीकरणों का एक ऐसा हल निकाला जो समय यात्रा को संभव बनाता था। समय की इस नदी के प्रवाह मे अब कुछ भंवर आ गये थे जहां समय एक वृत्त मे चक्कर लगाता था ! गोयेडल का हल शानदार था, वह हल एक ऐसे ब्रह्मांड की कल्पना करता था जो एक घूर्णन करते हुये द्रव से भरा है। कोई भी इस द्रव के घूर्णन की दिशा मे चलता जायेगा अपने आपको प्रारंभिक बिन्दू पर पायेगा लेकिन भूतकाल मे !
अपने वृत्तांत मे आईन्स्टाईन ने लिखा है कि वे अपने समीकरणों के हल मे समययात्रा की संभावना से परेशान हो गये थे। लेकिन उन्होने बाद मे निष्कर्ष निकाला कि ब्रह्मांड घूर्णन नही करता है, वह अपना विस्तार करता है(महाविस्फोट – Big Bang Theory)। इस कारण गोएडल के हल को माना नही जा सकता। स्वाभाविक है कि यदि ब्रह्मांड घूर्णन करता होता तब समय यात्रा सारे ब्रह्मांड मे संभव होती।
१९६३ मे न्युजीलैंड के एक गणितज्ञ राय केर ने घूर्णन करते हुए ब्लैक होल के लिये आइंसटाईन के समीकरणों का हल निकाला। इस हल के कुछ विचित्र गुणधर्म थे। इसके अनुसार घूर्णन करता हुआ ब्लैक होल एक बिन्दु के रूप मे संकुचित ना होकर एक न्युट्रान के घुमते हुये वलय के रूप मे होगा। यह वलय इतनी तेजी से घुर्णन करेगा कि अपकेन्द्री बल(centrifugal force) इसे एक बिन्दु के रूप मे संकुचित नही होने देगा। यह वलय एक तरह से एलीस के दर्पण के जैसे होगा। इस वलय मे से जानेवाला यात्री मरेगा नही बल्कि एक दूसरे ब्रह्मांड मे चला जायेगा। इसके पश्चात आईन्सटाईन के समीकरणॊ के ऐसे सैंकड़ो हल खोजे जा चूके है जो समय यात्रा या अंतरिक्षीय सूराख़ों (Wormholes) की कल्पना करते है।
अंतरिक्षिय सूराख (Wormhole)
ये अंतरिक्षीय सूराख ना केवल अंतरिक्ष के दो स्थानो को जोड़ते है बल्कि दो समय क्षेत्रो को भी जोड़ते है। तकनीकी रूप से इन्हे समय यात्रा के लिये प्रयोग किया जा सकता है। हाल ही मे क्वांटम सिद्धांत मे गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को जोड़ने के जो प्रयास हुये है उपर दिये गये विरोधाभासो के बारे मे कुछ और जानकारी दी है। क्वांटम भौतिकी मे किसी भी वस्तु की एक से ज्यादा अवस्था हो सकती है। उदाहरण के लिये एक इलेक्ट्रान एक समय मे एक से ज्यादा कक्षा मे हो सकता है(इसी तथ्य पर ही सारे रासायनिक सिद्धांत आधारित है)। क्वांटम भौतिकी के अनुसार स्क्राडीन्गर की बिल्ली एक साथ दो अवस्था मे हो सकती है, जीवित और मृत। इस सिद्धांत के अनुसार भूतकाल मे जाकर उसमे परिवर्तन करने पर जो परिवर्तन होगे उससे एक समानांतर ब्रम्हाण्ड बनेगा। मौलिक ब्रम्हाण्ड वैसा ही रहेगा।
यदि हम भूतकाल मे जाकर महात्मा गांधी को बचाते है तब हम किसी और के भूतकाल को बचा रहे होंगे, हमारे गांधी फिर भी मृत ही रहेंगे। महात्मा गांधी को हत्यारे से बचाने पर  ब्रह्मांड दो हिस्सो मे बंट जायेगा, एक ब्रह्मांड जहां गाधींजी की हत्या नही हुयी होगी, दूसरा हमारा मौलिक ब्रह्मांड जहां गांधीजी की हत्या हुयी है। इसका मतलब यह नही कि हम एच जी वेल्स के समय यान मे प्रवेश कर समय यात्रा कर सकते है! अभी भी कई रोड़े है !
पहली, मुख्य समस्या है उर्जा ! एक कार के लिये जिस तरह पेट्रोल चाहीये उसी तरह समययान के लिये काफी सारी मात्रा मे ऊर्जा चाहिये! इतनी मात्रा मे ऊर्जा प्राप्त करने के लिये हमे किसी तारे की संपूर्ण ऊर्जा का उपयोग करने के तरीके सीखने होगें या असाधारण पदार्थ जैसे ऋणात्मक पदार्थ(Negative Matter) (ऐसा पदार्थ जो गुरुत्वाकर्षण से उपर जाये, निचे ना गिरे) खोजना होगा या ऋणात्मक ऊर्जा(Negative Energy) का श्रोत खोजना होगा। (ऐसा माना जाता था कि ऋणात्मक ऊर्जा असंभव है लेकिन अल्प मात्रा मे ऋणात्मक ऊर्जा का प्रयोगिक सत्यापन कैसीमीर प्रभाव(Casimir effect) से हो चूका है।) ऋणात्मक ऊर्जा का बड़े पैमाने पर उत्पादन कम से कम अगली कुछ शताब्दीयो तक संभव नही है। ऋणात्मक पदार्थ अभी तक खोजा नही गया है। ध्यान दे ऋणात्मक पदार्थ प्रतिपदार्थ (Antimatter) याश्याम पदार्थ(Dark Matter) नही है।
इसके अलावा समस्या स्थायित्व की भी है। केर का ब्लैक होल अस्थायी हो सकता है, यह किसी के प्रवेश करने से पहले ही बंद हो सकता है। क्वांटम भौतिकी के अंतिरिक्षिय सूराख भी किसी के प्रवेश करने से पहले बंद हो सकते है। दुःर्भाग्य से हमारी गणित इतनी विकसित नही हुयी है कि वह इन अंतिरिक्षिय सूराखो(Wormholes) के स्थायित्व की गणना कर सके क्योंकि इसके लिये हमे “थ्योरी आफ एवरीथिंग(Theory of Everything)” चाहिये जो गुरुत्व और क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतो का एकीकरण कर सके। अभी तक थ्योरी आफ एवरीथिंग का एक ही पात्र सिद्धांत है सुपरस्ट्रींग थ्योरी(Super String Theory)। यह एक ऐसा सिद्धांत है जो अच्छी तरह से परिभाषित अवश्य है लेकिन इसका हल अभी तक किसी के पास नही है।
स्याम विवर (Black Hole)
स्याम विवर (Black Hole)
मजेदार बात यह है कि स्टीफन हांकिन्ग ने समय यात्रा की अवधारणा का विरोध किया था। उन्होने यह भी कहा था कि उनके पास इसके अनुभवजन्य प्रमाण है। उनके अनुसार यदि समय यात्रा संभव है, तब भविष्य से आने वाले समय यात्री कहां है ? भविष्य से कोई यात्री नही है, इसका अर्थ है समय यात्रा संभव नही है। लेकिन पिछले कुछ वर्षो मे सैधांतिक भौतिकी मे काफी नयी खोज हुयी है ,जिससे प्रभावित होकर हाकिंग ने अपना मत बदल दिया है। अब उनके अनुसार समय यात्रा संभव है लेकिन प्रायोगिक(practical) नही !
हमारे पास भविष्य से यात्री इस कारण नही आते होंगे क्योंकि हम इतने महत्वपूर्ण नही है। समय यात्रा कर सकने में सफल सभ्यता काफी विकसीत होगी, वह किसी तारे की सम्पूर्ण ऊर्जा के दोहन में सक्षम होगी।  जो भी सभ्यता किसी तारे की ऊर्जा पर नियंत्रण कर सकती है उनके लिये हम एक आदिम सभ्यता से बढकर कुछ नही है। क्या आप चिंटीयो को अपना ज्ञान, औषधी या ऊर्जा देते है ? आपके कुछ दोस्तो को तो शायद उनपर पैर रख कर कुचलने की ईच्छा होती होगी।
कल कोई आपके दरवाजे पर दस्तक दे और कहे कि वह भविष्य से आया है और आपके पोते के पोते का पोता है तो दरवाजा बंद मत करिये। हो सकता है कि वह सही हो।

Monday, 6 October 2014

ब्रह्माण्ड का केन्द्र कहाँ है?

                                                                    सरल उत्तर है कि
ब्रह्माण्ड का कोई केन्द्र नही है!
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ब्रह्माण्ड विज्ञान की मानक अवधारणाओं के अनुसार ब्रह्माण्ड का जन्म एक महाविस्फोट(Big Bang) मे लगभग 14 अरब वर्ष पहले हुआ था और उसके पश्चात उसका विस्तार हो रहा है। लेकिन इस विस्तार का कोई केण्द नही है, यह विस्तार हर दिशा मे समान है। महाविस्फोट को एक साधारण विस्फोट की तरह मानना सही नही है। ब्रह्माण्ड अंतरिक्ष मे किसी एक केन्द्र से विस्तारीत नही हो रहा है, समस्त ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है और यह विस्तार हर दिशा मे हर जगह एक ही गति से हो रहा है।
1929 मे एडवीन हब्बल ने घोषणा की कि उन्होने हम से विभिन्न दूरीयों पर आकाशगंगाओं की गति की गणना की है और पाया है कि हर दिशा मे जो आकाशगंगा हमसे जितनी ज्यादा दूर है वह उतनी ज्यादा गति से दूर जा रही है। इस कथन से ऐसा लगता है कि हम ब्रह्माण्ड के केन्द्र मे है; लेकिन तथ्य यह है कि यदि ब्रह्माण्ड का विस्तार हर जगह समान गति से हो रहा हो तो हर निरीक्षण बिंदु से ऐसा प्रतीत होगा कि वह ब्रह्मांड के केन्द्र मे है और उसकी हर दिशा मे आकाशगंगाये उससे दूर जा रही है।
मान लिजीये की तीन आकाशगंगाये “अ”,”ब” और “स” है। यदि आकाशगंगा “ब” आकाशगंगा “अ” से 10,000 किमी/सेकंड की गति से दूर जा रही हो तो, आकाशगंगा “ब” मे स्थित परग्रही जीव को आकाशगंगा अ विपरीत दिशा मे 10,000 किमी/सेकंड से दूर जाते हुये दिखेगी। यदि आकाशगंगा “स” आकाशगंगा “ब” की दिशा मे दोगुनी दूरी पर हो तो उसकी गति आकाशगंगा “अ” से 20,000 किमी/सेकंड होगी लेकिन आकाशगंगा “ब” के परग्रही के लिये 10,000 किमी/सेकंड ही होगी।
आकाशगंगा “अ”आकाशगंगा “ब”आकाशगंगा “स”
आकाशगंगा “अ” से0 किमी/सेकंड10,000 किमी/सेकंड20,000 किमी/सेकंड
आकाशगंगा “ब” से-10,000 किमी/सेकंड0 किमी/सेकंड10,000 किमी/सेकंड
इस तरह आकाशगंगा ब के परग्रही के अनुसार हर दिशा मे सभी कुछ उससे दूर जा रहा है। इसी तरह से हमारी भी हर दिशा मे सभी कुछ दूर जा रहा है।

प्रसिद्ध गुब्बारे का उदाहरण या रूपक

ब्रह्माण्ड के विस्तार को समझने के लिये सबसे सरल उदाहरण अंतरिक्ष की फूलते गुब्बारे की सतह से तुलना है। यह प्रसिद्ध तुलना आर्थर एडींगटन ने 1933 मे अपनी पुस्तक “The Expanding Universe” मे की थी। इसके पश्चात फ़्रेड हायल ने 1960 मे अपनी पुस्तक “The Nature of the Universe” मे की थी। होयल ने लिखा था कि
“मेरे अगणितज्ञ मित्र अक्सर मुझसे कहते है कि उन्हे ब्रह्माण्ड विस्तार को एक चित्र के रूप मे देखने मे कठिनाई होती है। उन्हे समझाने के लिये गणित के सूत्रों का प्रयोग करने की बजाये मुझे उन्हे ब्रह्माण्ड के विस्तार को फूलते हुये गुब्बारे की सतह जिस पर बहुत से बिंदु बने हो के रूप समझाने मे आसानी होती है। जब गुब्बारे को फूलाया जाता है तब उसकी सतह पर के बिंदु एक दूसरे से समान रूप से दूर जाते है उसी तरह से आकाशगंगाओं के मध्य का अंतराल भी बड रहा है।”
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गुब्बारे का उदाहरण अच्छा है लेकिन इसे सही तरह से समझना होगा अन्यथा वह विषय को और उलझा देगा। होयल ने पहले ही चेता दिया है कि
“ब्रह्माण्ड के विस्तार मे कई ऐसे पहलू है जोकि गलत संकेत दे सकते है”।
ध्यान दें कि यहां पर हम गुब्बारे की द्वि-आयामी सतह की तुलना त्री-आयामी अंतरिक्ष से कर रहे है। हम गुब्बारे की तुलना अंतरिक्ष से नहीं, हम “गुब्बारे की सतह” की तुलना अंतरिक्ष से कर रहे है।
गुब्बारे की सतह समांगी(homogeneous) है जिसमे किसी भी बिंदु को केंद्र नही माना जा सकता है। गुब्बारे का केंद्र उसकी सतह पर नही है और उसे ब्रह्माण्ड के केंद्र के जैसे नही माना जाना चाहिये। यदि आपको सरल लगे तो आप गुब्बारे की त्रिज्या(radial) दिशा को समय मान सकते है। यह होयल का सुझाब था जो इसे और भी उलझा सकता है। सबसे सरल है कि आप गुब्बारे की सतह के अतिरिक्त किसी भी बिंदु को ब्रह्मांड का भाग ना समझे। गणितज्ञ गास मे 19वीं सदी के प्रारंभ मे कहा था कि अंतरिक्ष के गुणधर्म जैसे वक्रता को ऐसी अंतर्भूत राशीयों के रूप मे भी समझा जा सकता है जिनका मापन वक्रता के कारण को जाने बिना भी किया जा सकता हो। किसी बाह्य आयाम की अनुपस्थिती मे भी अंतरिक्ष मे वक्रता संभव है। गास मे अंतराल की वक्रता का मापन का प्रयास तीन पर्वतों की चोटीयो से बने त्रिभूज के कोणो के मापन से किया था।
आप जब भी गुब्बारे के उदाहरण के बारे मे सोचें हमेशा ध्यान मे रखे कि
  • गुब्बारे की द्विआयामी सतह अंतरिक्ष के तीन आयामो के समरूप है।
  • त्रीआयामी अंतरिक्ष जो गुब्बारे के अंतर्भूत है, वह किसी अन्य भौतिक आयाम के समरूप नही है, आप चाहे तो उसे उसे आप समय के समरूप मान सकते है।
  • गुब्बारे का केन्द्र किसी भी भौतिक वस्तु के समरूप नही है, उसे आप अंतरिक्ष/ब्रह्मांड का भाग ना माने।
  • संभव है कि ब्रह्माण्ड आकार मे सीमित हो और गुब्बारे की सतह जैसे विस्तार कर रहा हो लेकिन वह असीमित भी हो सकता है।
  • आकाशगंगाये गुब्बारे की सतह के बिंदुओं की तरह एक दूसरे से दूर जा रही है लेकिन आकाशगंगाये स्वयं गुरुत्वाकर्षण से बंधी है, वह बिखर नही रही है।

…..लेकिन यदि महाविस्फोट(Big Bang) एक विस्फोट था तो…

किसी सामान्य विस्फोट मे पदार्थ विस्फोट केंद्र से बाहर की दिशा की ओर फैलता है। विस्फोट प्रक्रिया शुरु होने के एक क्षण के पश्चात केंद्र सबसे ज्यादा गर्म बिंदु होता है। उसके पश्चात केन्द्र से सभी दिशाओं की ओर पदार्थ एक गोले की शक्ल मे बाहर जाता है। महाविस्फोट अर्थात बिग बैंग इस तरह का विस्फोट नही था। वह अंतरिक्ष काविस्फोट था, वह अंतरिक्ष मे विस्फोट नही था। स्टैंडर्ड माडेल के अनुसार बिग बैंग के पहले समय और अंतरिक्ष दोनो नही थे। सही मायनो मे समय के अनुपस्थिति मे “पहले” शब्द ही निरर्थक हो जाता है। बिग बैंग अन्य विस्फोटों से अलग था। यह हमे बताता है कि किसी एक बिंदु से बाह्य दिशा मे पदार्थ विस्तारित नही हो रहा है, बल्कि अंतरिक्ष हर दिशा मे समान गति से विस्तारित हो रहा है।
यदि बिग बैंग किसी उपस्थित अंतरिक्ष मे एक साधारण विस्फोट के जैसे हुआ होता तो हम इस विस्फोट की विस्तारित होती सीमा को देख पाते क्योंकि उसके पश्चात रिक्त अंतरिक्ष होता। लेकिन हम भूतकाल मे देखने का प्रयास करते हैं तो हर दिशा मे बिग बैंग के प्रभाव को देखते है। यह ब्रहमाण्डिय माइक्रोवेव विकिरण अर्थात कास्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड विकिरण हर दिशा मे संमागी है। यह भी दर्शाता है कि पदार्थ किसी बिंदु से बाह्य दिशा की ओर नही जा रहा है बल्कि अंतरिक्ष ही हर दिशा मे समान रूप से विस्तार कर रहा है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि अभी तक के समस्त निरीक्षण भी यही दर्शाते है कि ब्रह्माण्ड का कोई केंद्र नही है। यह एक तथ्य है कि ब्रह्माण्ड के समान रूप से विस्तार से यह संभावना समाप्त नही होती कि एक गर्म घना ब्रह्माण्डिय केंद्र संभव नही है लेकिन आकाशगंगाओं के वितरण और गति के अध्ययन ने यह स्थापित कर दिया है कि हमारे निरीक्षण की सीमा के अंतर्गत ऐसा कोई केंद्र नही है।

ब्रह्माण्डिय सिद्धांत(cosmological principle)

1933 मे आर्थर मिलेने ने ब्रह्माण्डिय सिद्धांत(cosmological principle) प्रस्तुत किया था जिसके अनुसार ब्रह्माण्ड का एक समान(समांगी और सावर्तिक) होना चाहिये। इसके कुछ पहले ही यह माना जाता था कि ब्रह्माण्ड मे केवल हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी ही है और उसका केंद्र ब्रह्माण्ड का केंद्र है। 1924 मे हब्बल द्वारा अन्य आकाशगंगाओं की खोज ने इस बहस को समाप्त कर दिया। आकाशगंगाओं के वितरण की संरचना मे काफी खोज हो जाने के पश्चात भी अनेक खगोल विज्ञानी इस सिद्धांत को दार्शनिक रूप से मानते है क्योंकि यह एक ऐसी उपयोगी अवधारणा है जिसके विरोध मे कोई प्रमाण नही मिला है। लेकिन ब्रह्माण्ड का हमारा परिप्रेक्ष्य प्रकाश गति तथा बिग बैंग के पश्चात के सीमित समय द्वारा अवरोधित है। हमारे द्वारा निरीक्षित किया जा सकने वाला ब्रह्माण्ड विशाल है, लेकिन संभवतः वह समस्त ब्रह्माण्ड की तुलना मे बहुत क्षुद्र हो सकता है, ब्रह्माण्ड असीमित भी हो सकता है। हमारे द्वारा देखे जा सकने वाले ब्रह्माण्ड के क्षितीज के पश्चात क्या है? इसे जानने के लिये हमारे पास कोई साधन या उपाय नही है, हम यह भी नही जान सकते है कि यह ब्रह्माण्डिय सिद्धांत(cosmological principle) सही है या गलत।
1927 मे जार्ज लेमैत्रे ने अंतरिक्ष के विस्तार के लिये आइंस्टाइन के सापेक्षतावाद के समीकरणो का हल निकाला। इन्ही समिकरणो के हल के आधार पर उन्होने बिगबैंग सिद्धांत को प्रस्तावित किया। इन समिकरणो के हल पर आधारित माडेल को फ़्रीडमैन-लैमीत्रे-राबर्टसन-वाकर(Friedman-Lemaitre-Robertson-Walker (FLRW)) माडेल कहा जाता है। फ़्रीडमैन ने इस माडेल को खोजा था लेकिन उसे सही माडेल नही माना था। यह बहुत कम लोग को ज्ञात है कि लैमीत्रे ने एक ऐसा माडेल भी बनाया था जो गोलाकार सममिती मे विस्तार करते हुये ब्रह्माण्ड का था। इस माडेल को लैमीत्रे-टालमन-बांडी माडेल(Lemaître-Tolman-Bondi (LTB))कहा जाता है, इस माडेल के अनुसार ब्रह्मांड का केण्द्र संभव है। हमारे पास यह मानने का कोई आधार नही है कि LTB माडेल सही नही है क्योंकि FLWR माडेल यह LTB माडेल का एक विशेष सिमीत प्रकार है। FLWR माडेल यह एक ऐसा सन्निकटिकरण है को निरीक्षण किये जा सकने वाले ब्रह्माण्ड के लिये सही है लेकिन उसके बाह्य कुछ कहा नही जा सकता है।
ब्रह्मांड की संरचना और भी अन्य आकारो मे संभव है जिसमे केंद्र हो भी सकता है या नही भी हो सकता है। निरीक्षण किये जा सकने वाले ब्रह्माण्ड के पैमाने पर उसका केंद्र नही है। लेकिन यदि यह पाया जाता है कि निरीक्षण किये जा सकने वाले ब्रह्माण्ड से बडे पैमाने पर ब्रह्माण्ड का केंद्र है तब यह भी संभव है कि उससे भी बड़े पैमाने पर वह ऐसे अनेक ब्रह्मांड केंद्रो मे से एक हो, ठीक उसी तरह जैसे कुछ समय पहले मंदाकिनी आकाशगंगा का केंद्र ब्रह्माण्ड का केंद्र था।
साधारण शब्दों मे बिग बैंग सिद्धांत की अवधारणा के अनुसार विस्तार करते हुये ब्रह्माण्ड का कोई केंद्र नही है और यह अब तक के निरीक्षणो के आधार पर सही है। लेकिन यह भी संभव है कि हमारे निरीक्षण से बड़े पैमाने पर यह सही ना हो। हमारे आप इस प्रश्न का अकाट्य उत्तर नही है कि ब्रह्माण्ड का केंद्र कहां है?

Thursday, 14 August 2014

4 अक्तूबर 1957 : ‘स्पुतनिक’ का प्रक्षेपण

स्पुतनिक की प्रतिकृति
चार अक्तूबर का दिन मानव के अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास मे एक स्वर्णिम पृष्ठ है। इसी दिन चार अक्तूबर 1957 को पृथ्वी की सतह से पहली मानव-निर्मित वस्तु – रूसी उपग्रह ‘स्पुतनिक‘ अंतरिक्ष में छोड़ा गया। रूसी समाचार एजंसी, ‘टास’ के मुताबिक़ उपग्रह का वज़न क़रीब 84 किलोग्राम था और इसे पृथ्वी की निचली कक्षा मे स्थापित किया गया था।
पृथ्वी की कक्षा मे स्पुतनिक (चित्रकार की कल्पना पर आधारित)


यह मानव का पहला तकनिकी अंतरिक्ष अभियान था लेकिन इस अभियान ने उपरी वातावरण की परतों के घनत्व की गणना की। इसने वातावरण के आयनोस्फियर मे रेडीयो संकेतो के वितरण के आंकड़े जमा किये। इस उपग्रह मे उच्च दबाव मे भरी नायट्रोजन गैस से किसी उल्का की जांच का प्रथम अवसर प्रदान किया था। यदि उल्का द्वारा इस उपग्रह की टक्कर होती तो यान मे हुये छेद से हुये तापमान मे आये अंतर को पृथ्वी तक भेजा जा सकता था।
स्पुतनिक‘ को कजाकिस्तान के बैकानूर अंतरिक्ष प्रक्षेपण केन्द्र से प्रक्षेपित किया गया था। इस उपग्रह ने 29000 किमी/प्रति घंटा की गति से यात्रा की थी, तथा पृथ्वी की एक परिक्रमा के लिए 96.2 मिनिट लिये थे। इस उपग्रह ने 20.005 तथा 40.002 मेगा हर्टज पर रेडीयो संकेत भेजे थे जिन्हे सारे विश्व मे शौकिया रेडीयो आपरेटरो ने भी प्राप्त किया था। पश्चिमी देशों के वैज्ञानिकों ने भी इन रेडियो तरंगों पर शोध किया। इस उपग्रह से संकेत बैटरी के समाप्त होने तक 22 दिनो तक(26 अक्टूबर 1957) प्राप्त होते रहे। ‘स्पुतनिक’ 4 जनवरी 1958 पृथ्वी के वातावरण मे गीर कर जल गया, तब तक इसने 600 लाख किमी की यात्रा कर ली थी और अपनी कक्षा मे 3 महीने रहा था।
नवंबर 1957 में रूस ने ‘स्पुतनिक-2‘ को अंतरिक्ष में भेजा। इस उपग्रह में एक कुत्ते, ‘लाइका‘, को भी भेजा गया ताकि इंसान को अंतरिक्ष में भेजने के बारे में जानकारी जुटाई जा सके। रूस और अमरीका, दोनों ने ही वर्ष 1957 में उपग्रह भेजने की योजना बनाई थी लेकिन अमरीका फरवरी 1958 में ही ये कर पाया। लेकिन अंतरिक्ष की खोज के अभियान में रूस अमरीका से आगे ही रहा। वर्ष 1961 में रूस ने विश्व के पहले व्यक्ति, अंतरिक्ष यात्री यूरी गागरिन को अंतरिक्ष में भेजा।

सौर मंडल की सीमा पर वायेजर 1 (On the boundary of the solar system, Voyager 1)

नासा के अंतरिक्ष यान वायेजर 1 के ताजा आंकड़ो से ऐसा लग रहा है कि वह सौर मंडल की सीमा पर पहुंच चूका है। अब वह ऐसे क्षेत्र मे है जहाँ पर सौर मंडल बाह्य आवेशित कणो की मात्रा स्पष्टतया अधिक है। वायेजर से जुड़े वैज्ञानिक इन सौरमंडल बाह्य आवेशित कणो की मात्रा मे आयी तीव्र वृद्धि से इस ऐतिहासिक निष्कर्ष पर पहुंचे है कि वायेजर अब ऐसा प्रथम मानव निर्मित यान है जो कि सौर मंडल की सीमा तक जा पहुंचा है।
चित्रकार की कल्पना मे वायेजर 1 की वर्तमान स्थिति


वायेजर से आने वाले आंकड़े पृथ्वी तक 17.8 अरब किमी की यात्रा करने मे अब 16 घंटे 38 मिनिट लेते है। नासा के डीप स्पेश नेटवर्क द्वारा प्राप्त वायेजर के आंकड़े सौरमंडल बाह्य आवेशित कणो की विस्तृत जानकारी देते है। ये आवेशित कण हमारे खगोलीय ब्रह्मान्डीय पड़ोस मे तारो के सुपरनोवा विस्फोट से उत्पन्न होते है।
वायेजर यान
जनवरी 2009 से जनवरी 2012 के मध्य मे ब्रह्माण्डीय विकिरण की मात्रा मे वायेजर ने 25% की वृद्धि दर्ज की है। लेकिन हाल ही मे वायेजर ने इन किरणो की मात्रा मे तीव्र वृद्धि देखी है, 7 मई 2012 के पश्चात इन कणो मे वृद्धि हर सप्ताह 5% की दर से हो रही है और पिछले एक महीने 9% मे वृद्धि देखी गयी है।
यह स्पष्ट वृद्धि हमारे अंतरिक्ष अभियान मे एक नये युग का प्रारंभ है। इस अंतरिक्षयान से प्राप्त सूचनाओं का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसने हीलीयोस्फीयर के आवेशित कणो की मात्रा मे कमी दर्ज की है। हीलीयोस्फीयर सूर्य द्वारा उत्सर्जित आवेशित कणो का एक बुलबुला है। जब वायेजर सौर मंडल की सीमा पार कर जायेगा, तब सूर्य द्वारा उत्सर्जित कणो की मात्रा मे एक तेज कमी आयेगी और एक नया इतिहास बनेगा।
वायेजर से प्राप्त सौर मंडल के इन अंतिम आंकड़ो से वैज्ञानिक को पता चलेगा कि वायेजर यान को घेरे हुये चुंबकिय धाराओं की दिशा मे परिवर्तन हो गया है। जब वायेजर हिलीयोस्फीयर मे है तब इन चुंबकिय धाराओं की दिशा पूर्व से पश्चिम है। जब वायेजर सौर मंडल के बाहर खगोलिय क्षेत्र मे पहुंच जायेगा इन चुंबकिय धाराओं की दिशा उत्तर-दक्षिण होगी। इस विश्लेषण के लिये कई हफ़्ते लग जायेंगे और वायेजर वैज्ञानिक अभी इसका अध्यन कर रहे हैं।
वायेजर को 1977 मे प्रक्षेपित किया गया था, तब अंतरिक्ष अभियान केवल 20 वर्ष का था, उस समय किसी ने सोचा भी नही था कि वायेजर सौर मंडल की सीमाओं तक जा सकेगा। लेकिन वायेजर 1 (वायेजर 2 भी) ने सारी उम्मीदों से कहीं आगे जाकर अपने अभियान को एक नयी उंचाईयों तक पहुंचाया है।
यह दोनो यान अभी भी अच्छी अवस्था मे हैं। वायेजर 2 सूर्य से 14.7 अरब किमी दूरी पर हैं। दोनो वायेजर अभियान के तहत कार्य कर रहे है, जोकि सौर मंडल के ग्रहों के अध्यन का विस्तारित अभियान है।
वर्तमान मे वायेजर मानवता के सबसे दूरस्थ सक्रिय दूत है।

Chandrayaan - India’s first mission to Moon

Chandrayaan - India’s first mission to Moon

October 22nd, 2008
India has successfully launched its first mission to the Moon - Chandrayaan.The PSLV C-11 lifted off at 6:22 AM sharp, carrying the historic payload along.
 

The Path of Chandrayaan

The PSLV has successfully injected the Chandrayaan into an elliptical orbit around Earth. It will shift to a ‘transfer orbit’ and will eventually be captured by the moon’s gravity field via a final thrust towards our celestial neighbour.Chandrayaan carries 11 scientific instruments including 6 from India alone. and a symbolic Indian flag which is expected to detach from the craft and land on the moon.

After launch, Chandrayaan-1 will go around the earth twice, before being fired towards the moon. The entire journey of 386,000 km will take 5.5 days. It will take another 10 days to reach lunar orbit where it will remain and continuously mapping the lunar surface and sending back valuable data 5.5 days.
 

India's Chandrayaan programme is "ambitious"

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A moon rush is hotting up, with India, China and Japan devising substantial space exploration programmers to compete with the big players — the US and European Union. The frantic activity centered on the moon has been triggered off by two US expeditions in 1994 and 1998, which rediscovered the possibility of exploring lunar resources for national advantage. The discovery that earth’s only satellite may contain water in some form has only added to this intense interest, holding out, as it does, the possibility of human colonization.

On the positive side, interest in the moon is growing because of the renewed realisation that, as the most accessible celestial body, the moon could be a base for space research to unlock the mysteries of the solar system and provide vital scientific data.

Because the possibilities are great, the UN prepared a moon treaty, which came into force for ratifying countries in 1984, to impose regulation so that all countries would benefit from this ‘common resource’. But the ‘moon’ nations have consistently blocked any attempt at international regulation of space exploration, especially missions to the moon and other celestial bodies. None of the countries with moon programmes have ratified the treaty. The lack of regulation means that non-space countries will not benefit substantially from explorations — the principal reason for the existing players to jealously defend the status quo.

Though, at the moment, there is some degree of collaboration between some countries that have programmes in the pipeline, there is a high possibility that this will turn to competition when the stakes get bigger. For instance, National Aeronautics and Space Administration (NASA) and the European Space Agency (ESA) are collaborating with India on its moon programme — Chandrayaan. The US also has a broader agreement with India on collaboration in space exploration.

Path to the moon How Chandrayaan-1 will reach lunar orbit

 

The High Precision Success Story

Till 1999, India’s space programme was focussed on application-driven projects. Sending satellites to space with an eye to immediate benefits. But that didn’t mean that space scientists weren’t nursing the desire to explore space from more of a pure science perspective.

At an annual meeting of the Indian Academy of Sciences (IAS) in October 1999, a symposium was organised to discuss moon exploration, says V Adimurthy, whose team is designing the rocket for India’s proposed lunar orbiter, Chandrayaan-1, slated to take off by 2008, at the Vikram Sarabhai Space Centre, Thiruvananthapuram.

Planetary sciences have always been a stimulating subject. Venturing into this arena will also attract more bright students, Adimurthy says.

The possibility of finding water (in the form of ice) in the polar regions has been the trigger for the current rush in lunar exploration, says Annadurai. The presence of water could possibly help colonise the moon, an idea dropped like a hot brick in 1974 as it was found to be an exorbitant proposition. Apart from being available for drinking, water in any form can be split into oxygen for breathing and hydrogen as fuel for rockets as well as land rovers. It can result in substantial cost saving, if permanent human residence is planned. Carrying a litre of water from earth could cost a whopping US $67,000 (about Rs 30 lakh).

As a result of the past missions, including several Apollo and Luna landers, a huge amount of data, covering chemical, geophysical and geochronological aspects have been collected. The Apollo and Luna missions had also brought back nearly 380 kg of moon rock and dust, collected from nine different locations in the equatorial regions of the near side of the moon. However, scientists found the data wanting for accurate modelling of the chemical and physical evolution of the moon. The details of these chemical and physical processes, their time scales and the extent to which the moon was subjected to them have not been fully understood.

According to Nair, ISRO has always pursued space science-related activities. The first space launch undertaken by ISRO was a sounding rocket meant for studying the equatorial electrojet (the large eastward flow of electrical current in the ionosphere that occurs around noon within 5° latitude of both sides of the magnetic equator) and ionosphere. “Besides, the scientific community in India is very enthusiastic about gathering information about the lunar features, particularly the terrain and mineral composition on its own,” he added.

Nair says the Chandrayaan-1 project offers two challenges. One is technological: designing the mission without outside support. “The farthest we have gone in space is 36,000 km (the Indian communication satellites of the INSAT family are parked at geosynchronous orbits 36,000 km away). Chandrayaan-1 has to travel 384,000 km,” he says. ISRO also needs to have control over the spacecraft during its planned life of two years. This means further work on orbital control and manoeuvring the probe. ISRO is currently setting up a deep-space tracking network closer to Bangalore at a cost of Rs 100 crore for command, control and tracking operations for Chandrayaan-1 and other spacecraft India may decide to launch later.

Indian scientists have also designed and are building all scientific instruments needed by Chandrayaan-1. “It’s a great challenge to build specialised cameras and gauges like spectrometers and altimeters at a scale that is suitable to the moon probe,” says Annadurai. He adds that these sophisticated gadgets have to be at least one-tenth the size used in normal satellites because of the much larger distances involved in a lunar mission and the larger costs involved. Besides, the instruments on the orbiter have to be more reliable than those on board remote-sensing satellites, because Chandrayaan-1 won’t have any back-up.

According to Annadurai, another objective of Chandrayaan-1 will be to produce a gravity map of the moon. It is known that the moon has one-sixth of the gravity of the earth. Scientists also know that it is not uniformly distributed because it does not have a core with a strong enough gravitational pull and the lunar surface has mounds of iron-rich minerals distorting the magnetic force. “If we have to plan a landing mission or fly closer to the lunar surface in future, we need to have a precise gravity map of the moon worked out,” Annadurai says.

There was widespread support from the scientific community, despite the popular belief that the Apollo and Luna missions of the 1960s and early 1970s had gathered whatever information about the moon was needed. It was felt that an Indian mission would only “reinvent the wheel”. “This was a misconception, which got cleared because we could explain the gaps in the knowledge about the moon,” says Adimurth.

Tuesday, 22 April 2014

ब्रह्मांड की उत्पत्ती कैसे हुई?

सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत भी नहीं
अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था
छिपा था क्या कहाँ, किसने देखा था
उस पल तो अगम, अटल जल भी कहाँ था
ऋग्वेद(१०:१२९) से सृष्टि सृजन की यह श्रुती
लगभग पांच हजार वर्ष पुरानी यह श्रुति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी इसे रचित करते समय थी। सृष्टि की उत्पत्ति आज भी एक रहस्य है। सृष्टि के पहले क्या था ? इसकी रचना किसने, कब और क्यों की ? ऐसा क्या हुआ जिससे इस सृष्टि का निर्माण हुआ ?
अनेकों अनसुलझे प्रश्न है जिनका एक निश्चित उत्तर किसी के पास नहीं है। कुछ सिद्धांत है जो कुछ प्रश्नों का उत्तर देते है और कुछ नये प्रश्न खड़े करते है। सभी प्रश्नों के उत्तर देने वाला सिद्धांत अभी तक सामने नहीं आया है।
सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त सिद्धांत है महाविस्फोट सिद्धांत (The Bing Bang Theory)।
महाविस्फोट सिद्धांत(The Bing Bang Theory)
१९२९ में एडवीन हब्बल ने एक आश्चर्य जनक खोज की, उन्होने पाया की अंतरिक्ष में आप किसी भी दिशा में देखे आकाशगंगाये और अन्य आकाशीय पिंड तेजी से एक दूसरे से दूर हो रहे है। दूसरे शब्दों मे ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है। इसका मतलब यह है कि इतिहास में ब्रह्मांड के सभी पदार्थ आज की तुलना में एक दूसरे से और भी पास रहे होंगे। और एक समय ऐसा रहा होगा जब सभी आकाशीय पिंड एक ही स्थान पर रहे होंगे, लेकिन क्या आप इस पर विश्वास करेंगे ?
तब से लेकर अब तक खगोल शास्त्रियों ने उन परिस्थितियों का विश्लेषण करने का प्रयास किया है कि कैसे ब्रह्मांडीय पदार्थ एक दूसरे से एकदम पास होने की स्थिती से एकदम दूर होते जा रहे है।
इतिहास में किसी समय , शायद १० से २० खरब साल पूर्व , ब्रह्मांड के सभी कण एक दूसरे से एकदम पास पास थे। वे इतने पास पास थे कि वे सभी एक ही जगह थे, एक ही बिंदु पर। सारा ब्रह्मांड एक बिन्दु की शक्ल में था। यह बिन्दु अत्यधिक घनत्व(infinite density) का, अत्यंत छोटा बिन्दु(infinitesimally small ) था। ब्रह्मांड का यह बिन्दु रूप अपने अत्यधिक घनत्व के कारण अत्यंत गर्म(infinitely hot) रहा होगा। इस स्थिती में भौतिकी, गणित या विज्ञान का कोई भी नियम काम नहीं करता है। यह वह स्थिती है जब मनुष्य किसी भी प्रकार अनुमान या विश्लेषण करने में असमर्थ है। काल या समय भी इस स्थिती में रुक जाता है, दूसरे शब्दों में काल और समय के कोई मायने नहीं रहते है।*
इस स्थिती में किसी अज्ञात कारण से अचानक ब्रह्मांड का विस्तार होना शुरू हुआ। एक महा विस्फोट के साथ ब्रह्मांड का जन्म हुआ और ब्रह्मांड में पदार्थ ने एक दूसरे से दूर जाना शुरू कर दिया।
महा विस्फोट के १०-४३ सेकंड के बाद, अत्यधिक ऊर्जा(फोटान कणों के रूप में) का ही अस्तित्व था। इसी समय क्वार्क , इलेक्ट्रान, एन्टी इलेक्ट्रान जैसे मूलभूत कणों का निर्माण हुआ। इन कणों के बारे हम अगले अंको मे जानेंगे।
१०-३४ सेकंड के पश्चात, क्वार्क और एन्टी क्वार्क जैसे कणो का मूलभूत कणों के अत्याधिक उर्जा के मध्य टकराव के कारण ज्यादा मात्रा मे निर्माण हुआ। इस समय कण और उनके प्रति-कण (१) दोनों का निर्माण हो रहा था , इसमें से कुछ एक कण और उनके प्रति-कण(2) दूसरे से टकरा कर खत्म भी हो रहे थे। इस समय ब्रम्हांड का आकार एक संतरे के आकार का था।
१०-१० सेकंड के पश्चात, एन्टी क्वार्क क्वार्क से टकरा कर पूर्ण रूप से खत्म हो चुके थे, इस टकराव से फोटान का निर्माण हो रहा था। साथ में इसी समय प्रोटान और न्युट्रान का भी निर्माण हुआ।
१ सेकंड के पश्चात, जब तापमान १० खरब डिग्री सेल्सीयस था, ब्रह्मांड ने आकार लेना शुरू किया। उस समय ब्रह्मांड में ज्यादातर फोटान, इलेक्ट्रान , न्युट्रीनो (३) और उनके प्रती कणो के साथ मे कुछ मात्रा मे प्रोटान तथा न्युट्रान थे।
प्रोटान और न्युट्रान ने एक दूसरे के साथ मिल कर तत्वों(elements) का केन्द्र (nuclei) बनाना शुरू किया जिसे आज हम हाइड्रोजन, हीलीयम, लिथियम और ड्युटेरीयम के नाम से जानते है।
जब महा विस्फोट के बाद तीन मिनट बीत चुके थे, तापमान गिरकर १ खरब डिग्री सेल्सीयस हो चुका था, तत्व और ब्रह्मांडीय विकिरण(cosmic radiation) का निर्माण हो चुका था। यह विकिरण आज भी मौजूद है और इसे महसूस किया जा सकता है।
आगे बढ़ने पर ३००,००० वर्ष के पश्चात, विस्तार करता हुआ ब्रह्मांड अभी भी आज के ब्रह्मांड से मेल नहीं खाता था। तत्व और विकिरण एक दूसरे से अलग होना शुरू हो चुके थे। इसी समय इलेक्ट्रान , केन्द्रक के साथ में मिल कर परमाणु का निर्माण कर रहे थे। परमाणु मिलकर अणु बना रहे थे।
इस के १ खरब वर्ष पश्चात, ब्रह्मांड का एक निश्चित सा आकार बनना शुरू हुआ था। इसी समय क्वासर, प्रोटोगैलेक्सी(आकाशगंगा का प्रारंभिक रूप), तारों का जन्म होने लगा था। तारे हायड्रोजन जलाकर भारी तत्वों का निर्माण कर रहे थे।
आज महा विस्फोट के लगभग १५ खरब साल पश्चात की स्थिती देखे ! तारों के साथ उनका सौर मंडल बन चुका है। परमाणु मिलकर कठिन अणु बना चुके है। जिसमे कुछ कठिन अणु जीवन( उदा: Amino Acid) के मूलभूत कण है। यही नहीं काफी सारे तारे मर कर श्याम विवर(black hole) बन चुके है।
ब्रह्मांड का अभी भी विस्तार हो रहा है, और विस्तार की गति बढ़ती जा रही है। विस्तार होते हुये ब्रह्मांड की तुलना आप एक गुब्बारे से कर सकते है, जिस तरह गुब्बारे को फुलाने पर उसकी सतह पर स्थित बिन्दु एक दूसरे से दूर होते जाते है उसी तरह आकाशगंगाये एक दूसरे से दूर जा रही है। यह विस्तार कुछ इस तरह से हो रहा है जिसका कोई केन्द्र नहीं है, हर आकाश गंगा दूसरी आकाशगंगा से दूर जा रही है।
वैकल्पिक सिद्धांत(The Alternative Theory)
इस सिद्धांत के अनुसार काल और अंतरिक्ष एक साथ महा विस्फोट के साथ प्रारंभ नहीं हुये थे। इसकी मान्यता है कि काल अनादि है, इसका ना तो आदि है ना अंत। आये इस सिद्धांत को जाने।
आकाशगंगाओ(Galaxy) और आकाशीय पिंडों का समुह अंतरिक्ष में एक में एक दूसरे से दूर जाते रहता है। महा विस्फोट के सिद्धांत के अनुसार आकाशीय पिण्डो की एक दूसरे से दूर जाने की गति महा विस्फोट के बाद के समय और आज के समय की तुलना में कम है। इसे आगे बढाते हुये यह सिद्धांत कहता है कि भविष्य मे आकाशीय पिंडों का गुरुत्वाकर्षण इस विस्तार की गति पर रोक लगाने मे सक्षम हो जायेगा। इसी समय विपरीत प्रक्रिया का प्रारंभ होगा अर्थात संकुचन का। सभी आकाशीय पिंड एक दूसरे के नजदीक और नजदीक आते जायेंगे और अंत में एक बिन्दु के रुप में संकुचित हो जायेंगे। इसी पल एक और महा विस्फोट होगा और एक नया ब्रह्मांड बनेगा, विस्तार की प्रक्रिया एक बार और प्रारंभ होगी।
यह प्रक्रिया अनादि काल से चल रही है, हमारा विश्व इस विस्तार और संकुचन की प्रक्रिया में बने अनेकों विश्व में से एक है। इसके पहले भी अनेकों विश्व बने है और भविष्य में भी बनते रहेंगे। ब्रह्मांड के संकुचित होकर एक बिन्दु में बन जाने की प्रक्रिया को महा संकुचन(The Big Crunch) के नाम से जाना जाता है। हमारा विश्व भी एक ऐसे ही महा संकुचन में नष्ट हो जायेगा, जो एक महा विस्फोट के द्वारा नये ब्रह्मांड को जन्म देगा। यदि यह सिद्धांत सही है तब यह संकुचन की प्रक्रिया आज से १ खरब ५० अरब वर्ष पश्चात प्रारंभ होगी।
यथास्थिति सिद्धांत (The Quite State Theory)
महा विस्फोट का सिद्धांत सबसे ज्यादा मान्य सिद्धांत है लेकिन सभी वैज्ञानिक इससे सहमत नहीं हैं । वे मानते है कि ब्रह्मांड अनादि है, इसका ना तो आदि है ना अंत। उनके अनुसार ब्रह्मांड का महा विस्फोट से प्रारंभ नहीं हुआ था ना इसका अंत महा संकुचन से होगा।
यह सिद्धांत मानता है कि ब्रह्मांड का आज जैसा है वैसा ये हमेशा से था और हमेशा ऐसा ही रहेगा। लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है।

(१)कण और प्रति-कण: पदार्थ के हर मूलभूत कण का प्रतिकण भी होता है। जैसे इलेक्ट्रान के लिये एन्टी इलेक्ट्रान(पाजीट्रान), प्रोटान-एन्टी प्रोटान , न्युट्रान -एन्टीन्युट्रान इत्यादि. जब एक कण और उसका प्रतिकण टकराते है दोनों ऊर्जा(फोटान) में बदल जाते है। यदि आपको कभी आपका एन्टी मनुष्य मिले तब आप उससे हाथ मिलाने की गलती ना करें। आप दोनों एक धमाके के रूप में ऊर्जा में बदल जायेंगे।
(२)ये भी एक रहस्य है कि ब्रह्मांड के निर्माण के समय कण और प्रतिकण दोनों बने, लेकिन कणों की मात्रा इतनी ज्यादा क्यों है ? क्या प्रति ब्रह्मांड (Anti Universe) का भी अस्तित्व है ?
(३) न्युट्रीनो का मतलब न्युट्रान नहीं है, ये इलेक्ट्रान के समान द्रव्यमान रखते है लेकिन इन पर आवेश(+/-) नहीं होता